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| अंतर्राष्ट्रीय रोरिक स्मारक ट्रस्ट की बीसवीं वर्षगांठ के अवसर पर समारोह के उदघाटन में भारत में रूसी राजदूत महामहिम अ.म.कादाकिन का भाषण |

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नग्गर, 14 जुलाई, 2012 अंतर्राष्ट्रीय रोरिक स्मारक ट्रस्ट की इस महत्वपूर्ण वर्षगांठ के अवसर पर समारोह के सभी सहभागियों का मैं हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ. बीस वर्ष पहले जब मै रोरिक स्व्यतोस्लाव रोरिक द्वारा सौपित अधिकार पत्र लेकर यहाँ आया था तो एस्टेट की अत्यंत दयनीय स्थिति देख कर मुझे बहुत दुःख हुआ था . आज मैं सदा के लिए यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की रोरिक ट्रस्ट की स्थापना १९९२ में डॉ रोरिक के जीवन काल में ही हुई थी. ११९३ में उनकी विधवा श्रीमती देविका रानी ने ट्रस्ट का पंजीकरण करवाया.
भारत और रूस के लोगो के साथ-साथ दुनिया के करोड़ों लोगो के लिए रोरिक परिवार पारस्परिक समझ तथा मानवता की सुव्यवस्था और सौन्दर्य की अभिलाषा का प्रतीक है . उन्होंने हमारे लिए सर्व व्यापक मानवीय मूल्यों की एकरूपता को उजागर किया और संसार को अखंडता व् पारस्परिक निर्भरता के आदर्शों का उपहार प्रदान किया. उन्होंने हमें सुन्दरता, सर्वप्रथम संबंधों की सुन्दरता के माध्यम से दुनिया को बचाने का मार्ग दिखाया.
आज हम सब देख सकतें है कि इन २० सालों में रोरिक एस्टेट कितना सुन्दर हो गया है. अब यह एक ऐसे आत्मिक, शैक्षिक व् सांस्कृतिक चुम्बकीय केंद्र में परिवर्तित हो गया है जो सारे विश्व से अनेक लोगों को आकर्षित करता है. यह केवल संयोग नहीं है कि वह स्थान जहां मानव जाति के ऋषि, भविष्यद्रष्टा और प्रबुद्ध महापुरुष उपदेश देते थे और सृजन करते थे वह स्थान अध्यात्म, आराधना और तीर्थ के केंद्र बन जाते हैं. यह इसलिए होता है क्योंकि ऐसे स्थान उन महा ऋषियों के विचारों और कार्यों कि एकत्रित शक्ति से परिपूर्ण रहते हैं और उस शक्ति को सर्वत्र प्रसारित करते हैं . ईशवर द्वारा आशिर्वादित कुल्लू घाटी में पहुँच कर इस बात का अनुभव किये बिने नहीं रह सकते.
इस समय रोरिक ट्रस्ट कुल्लू घाटी और सारे हिमाचल प्रदेश के जीवन में अहम् भूमिका निभाता है. यह उत्तर भारत के सर्वाधिक आकर्षक पर्यटन स्थलों में विकसित हो गया है. प्रति वर्ष यहाँ लगभग एक लाख भारतीय तथा विदेशी पर्यटक और रोरिक के सृजनात्मक धरोहर के प्रशंसक आते हैं. हमारे लिए यह भी अत्यंत आवश्यक है कि यह स्थान भारत और रूस के लोगों के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मिलनसारिता को साकार करता है.
निसंदेह हर उल्लेखनीय घटना के मूल में कुछ समर्पित, उत्साही, प्रतिभावान और परिश्रमी लोगों का योगदान होता है. कुल्लू घाटी सिस्टर उर्सुला इच्स्तेद्त को कभी भी नहीं भूल पायेगी जिन्होंने अकेले और वीरान पड़े संग्रहालय को पुनर्जीवित किया.
मैं डॉ एलेना अदाम्कोवा का, जो कि ट्रस्ट कि लगातार दस सालों सेकार्यकारी निदेशिका थीं, विशेष रूप से धन्यवाद प्रकट करना चाहूँगा. प्रिय नग्गर निवासियों, आपके सहयोग और डॉ अदाम्कोवा के कठिन परिश्रम ने रोरिक एस्टेट को हिमाचल कि "शान" बना दिया है, ठीक वैसा ही जैसा कि इस ट्रस्ट के संस्थापकों ने सोचा था.
मैं एक बार फिर से स्वीकार करना चाहूँगा की अंतर्राष्ट्रीय रोरिक स्मारक ट्रस्ट मेरी पसंदीदा "कृति"है और मेरी प्रतिदिन की चिन्ताओ का विषय है. रुसी लोगों ने इस ट्रस्ट को अपने हृदय और आत्मा से सींचा है और अपने निजी धन तथा प्रयासों से हिमालय की गोदी में स्थित इस इस्टेट को संस्कृति, कला और ज्ञान का बहुमूल्य सर्वोच्च केंद्र बना दिया है. यहाँ पर किसी प्रकार की ईर्ष्या, दुर्भावना और छीटाकशी के लिये कोई स्थान नहीं है जैसा कि शिमला के कुछ तथा कथित और स्वघोषित «life trustees» करने का प्रयास कर रहे हैं. यह पवित्र स्थान सही मायने में एक अंतर्राष्ट्रीय निधि है। रोरिक की विरासत इतनी महत्वपूर्ण है कि वह सिर्फ कुल्लू घाटी या हिमाचल प्रदेश की नहीं हो सकती, वह केवल भारत या रूस की भी नहीं हो सकती है. इसकी प्रतिष्ठा सीमाओं से परे फैली हुई है. यह तो विश्व संस्कृति और सभ्यता की अद्वितीय धरोहर है. कुल्लू घाटी स्थित रोरिक इस्टेट को एक विश्व स्तरीय संग्रहालय के रूप में अत्यंत सावधानी पूर्वक संभाला जाना चाहिए. रूस चाहता है की स्थानीय अधिकारी तथा केंद्रीय नेतृत्व इस बात को पूरी तरह से समझे. हम चाहते है कि रोरिक ट्रस्ट में रचनात्मक सहयोग सुद्रढ़ हो और केंद्रीय सरकार ट्रस्ट के निर्णय लेने की प्रक्रिया में सीधे तौर से सम्मिलित हो जो कि भारत और रूस कि महत्वपूर्ण संयुक्त सांस्कृतिक परियोजना है. यह सदैव ऐसा ही रहेगा और इसके बारे में किसी को भी कोई संदेह नहीं रहना चाहिए. यह संतोषजनक है कि ट्रस्ट के कार्य कलापों का एक मत्वपूर्ण पक्ष बाल शिक्षा है. निकोलस रोरिक के सिद्धाँत "संस्कृति के माध्यम से शाँति की ओर" के धारक नई पीढ़ी ही है. १९९२ में स्व्यतोस्लाव रोरिक ने नग्गर ट्रस्ट कि आयोजक समिति से विशेष आग्रह कर के बाल शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दिलवाई जिससे बच्चों को इस प्रान्त की संपन्न प्रकृति और विशिष्ट परंपराओं से अवगत होने तथा रचनात्मक कार्यशालाओं के माध्यम से सांस्कृतिक और सौन्दर्यबोधी मूल्यों की खोज का अवसर मिल सके. गत नौ वर्षों से इस्टेट में हेलेन रोरिक कला विद्यालय सफतापूर्वक कार्यरत है जिसके परिणाम स्वरुप घाटी के सौ से भी अधिक बच्चों ने कला, लकड़ी पर नक्काशी, नृत्य, शास्त्रीय संगीत और बुनाई के क्षेत्रों में अध्ययन किया है. रोरिक ट्रस्ट प्रतिवर्ष बच्चों के लिए विशेष कार्यशालाओं का आयोजन करता है , जहाँ रूस तथा अन्य देशों से प्रतिष्ठित कलाकार, मूर्तिकार, संगीतज्ञ, नर्तक और शिक्षक आते हैं. यह अत्यंत प्रेरणादायक है की बच्चे इन आयोजनों में अत्यधिक उत्साह और प्रसन्नता से सम्मिलित होते है जो निकोलस रोरिक के उन रचनात्मक विचारों की पुष्टि करते हैं जो बताते हैं कि सुंदरता की शक्ति विभिन्न भाषाओं, जातियों और धर्मों के लोगों को एकजुट करती है।
मुझे विशेष रूप से प्रसन्नता है कि इस साल हमने रूसी शहर उल्यानोव्स्क से एक उत्कृष्ट नृत्य मंडली «एक्ज़ितोन» को हमारे समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है. इस मंडली के नौजवान परन्तु स्थापित और प्रसिद्ध कलाकार रुसी नृत्य परंपरा को हमारे मेहमानों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे. आशा है कि इन कलाकारों की प्रस्तुति रूस के रचनात्मक और सांस्कृतिक विरासत के रंग बिरंगे और विविध परिवेश से परिचय कराएगी.
निकोलस रोरिक जिन्होंने अपना जीवन शांति और संस्कृति के क्षेत्र में नए मार्ग विकसित करने में ही समर्पित किया, जिससे विभिन्न राष्ट्र शांति के झंडे तले इकठ्ठा हो सके. उन्होंने लिखा "हमें कला के दरवाज़ों को पूर्ण रूप से खोल देना चाहिय. केवल इसी प्रकार राष्ट्रों का वास्तविक भाईचारा पनपेगा". अपनी स्थापना के समय से ही अंतर्राष्ट्रीय रोरिक स्मारक ट्रस्ट का आधारभूत सिद्धाँत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और दोस्ती है. कोई भी भूतपूर्व या वर्तमान पदाधिकारी इस सिद्धाँत को रोक नहीं सकता.
हम उन पाखंडी व्यक्तियों को कभी भी सफल नहीं होने देंगे जो व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित होकर कलह के बीज बो रहे है और इस संक्युक्त कार्य में फूट डालने का काम कर रहे है, इस पवित्र आधार को तोड़ने में लगे हैं. रूसी पक्ष किस भी अल्पकालिक मुश्किल से नाजायज फायदा उठाने या अफवाहों के माध्यम से अनैतिक आचरण को बढाने के पूर्ण विरोध में है. हम पारस्परिक समझदारी, एकता और सहयोग के प्रकाश में रचनात्मक समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध हैं. संयुक्त अनुसंधान, शैक्षिक कार्य और सक्रिय सांस्कृतिक आदान-प्रदान देशों और महाद्वीपों के बीच सब से मज़बूत संपर्क बनाते हैं. यह ख़ुशी की बात है की अंतर्राष्ट्रीय रोरिक स्मारक ट्रस्ट के रचनात्मक प्रयास , जिन्हें रूस व भारत, लिथुआनिया, इटली, ब्राज़ील, कज़ाखस्तान, एस्टोनिया और अमरीका सहित अन्य दुसरे देशों का भी समर्थन हासिल है, उत्कृष्ट परिणाम सामने ला रहे है.
हम इस बात का विश्वास दिलाते है की अंतर्राष्ट्रीय रोरिक स्मारक ट्रस्ट के अन्दर भारत और रूस के बीच सहयोग को और बढाने व् मज़बूत करने के लिए हम यथासंभव प्रयास करेंगे. हम ऐसी कामना करते है की नग्गर स्थित यह स्मारक फले फुले, मार्गदर्शन करे और भिन्न - भिन्न देशों के उन लोगों को मिलाने और एकजुट करने काम करे जो एक श्रेष्ठतर और बेहतर सामंजस्य वाले विश्व की आकांक्षा रखते है.
रोरिक परिवार की विरासत विश्वव्यापी है। इस विख्यात परिवार के प्रत्येक सदस्य ने विश्व के सांस्कृतिक कैनवास पर एक विशिष्ट अनूठी छाप छोड़ी है. तीसरे दशक में प्रवेश करते समय ट्रस्ट को उन सभी मतभेदों को पीछे छोड़ देना चाहिए, जो कभी अवास्तविक और क्लिष्ट-कल्पित होते हैं तो कभी जान बूझ कर उत्पन्न किये जाते हैं. हमें रोरिक परिवार की अध्यात्मिक धरोहर को संभालने, बढाने और चिरायु बनाने के नेक काम में सहयोग करना चाहिए . उनका सबसे बड़ा उपहार भारत और रूस के बीच स्नेह है. किसी भी व्यक्ति को इस समय की कसौटी पर खरी उतरी दोस्ती को जिसको हिमालय प्रदत्त "ओम शांति" मन्त्र ने पवित्रिकृत किया हो, हम क्षीण नहीं करने देंगे. ७० वर्ष पहिले , १९४२ में इसको जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा गांधी और निकोलस रोरिक द्वारा पवित्रिकृत किया गया था जब नेहरु परिवार रोरिक परिवार का मेहमान था.
रुसी भारतीय रोरिक स्मारक ट्रस्ट अमर रहे...! |








